चीन का शक्ति प्रदर्शन और ट्रंप की व्यापार नीति का खतरा
यह परेड केवल एक स्मृति दिवस का आयोजन नहीं था, बल्कि यह चीन द्वारा दुनिया को दिया गया एक संदेश था – कि बीजिंग अब केवल एशिया का ही नहीं, बल्कि वैश्विक स्तर पर भी एक मजबूत शक्ति केंद्र बन चुका है। चीन की सैन्य शक्ति और तकनीकी प्रगति ने यह साफ कर दिया कि वह अब अमेरिका-प्रधान विश्व व्यवस्था को सीधी चुनौती देने की तैयारी कर रहा है।
दूसरी ओर, हज़ारों किलोमीटर दूर वॉशिंगटन डीसी में व्हाइट हाउस के अंदर बैठे अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप** भी इस आयोजन पर पैनी नज़र रखे हुए थे। ट्रंप ने परेड को लेकर टिप्पणी की – वे चाहते थे कि मैं देखूं, और मैं देख रहा था।
ट्रंप का यह बयान हल्का-फुल्का जरूर लगा, लेकिन इसके पीछे गहरी राजनीतिक चिंता छिपी हुई है। एक ओर जहां चीन अपनी सैन्य ताक़त का दम भरते हुए खुद को विश्व शक्ति के रूप में स्थापित करने की कोशिश कर रहा है, वहीं दूसरी ओर अमेरिका इस बढ़ते प्रभाव को लेकर असमंजस और सतर्कता दोनों ही भावनाओं से जूझ रहा है।
इस पूरे आयोजन से निकलने वाला सबसे बड़ा संकेत यही था कि दुनिया अब तेजी से बहुध्रुवीयता (Multipolar World) की ओर बढ़ रही है। अमेरिकी वर्चस्व, जो पिछले एक सदी से वैश्विक राजनीति और अर्थव्यवस्था पर हावी रहा है, अब धीरे-धीरे चीन जैसी उभरती शक्तियों की चुनौती का सामना कर रहा है।
ट्रंप की प्रतिक्रिया और नाराज़गी
ट्रंप ने एक पॉडकास्ट इंटरव्यू में कहा कि उन्हें चीन की ताक़त के इस प्रदर्शन से कोई चिंता नहीं है। लेकिन उसी रात उन्होंने सोशल मीडिया पर चीन को द्वितीय विश्व युद्ध में अमेरिका की भूमिका का श्रेय न देने पर नाराज़गी जताई।
उन्होंने तंज कसते हुए लिखा – *“कृपया व्लादिमीर पुतिन और किम जोंग उन को मेरी शुभकामनाएं दें, क्योंकि आप अमेरिका के खिलाफ साज़िश रच रहे हैं।”
चीन का मकसद – इतिहास को फिर से लिखना?
विशेषज्ञों का मानना है कि चीन अब वैश्विक नियमों को अपने हिसाब से गढ़ने की कोशिश कर रहा है। इस परेड में चीन ने केवल आधुनिक हथियार ही नहीं दिखाए, बल्कि यह संदेश भी दिया कि एशिया में जापान की हार में उसका योगदान अहम था।
वैश्विक समीकरणों में बदलाव
इसी हफ्ते चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग ने रूस के राष्ट्रपति पुतिन और भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के साथ आर्थिक शिखर सम्मेलन किया। यह संकेत है कि अमेरिका की व्यापार नीतियों से असंतुष्ट देश अब नए गठबंधन की ओर बढ़ रहे हैं।
ट्रंप की "अमेरिका फर्स्ट" पॉलिसी और ऊँचे टैरिफ़ ने कई देशों के साथ रिश्तों में तनाव पैदा किया है। नतीजा यह है कि चीन, रूस और भारत जैसे बड़े देश आपसी नज़दीकी बढ़ा रहे हैं।
ट्रंप की ट्रेड पॉलिसी पर कानूनी संकट
अमेरिकी अदालत ने हाल ही में ट्रंप की कई टैरिफ़ नीतियों को अवैध करार दिया है। अगर सुप्रीम कोर्ट ने भी इन्हें खारिज कर दिया, तो उनकी पूरी ट्रेड पॉलिसी ढह सकती है।
यानी ट्रंप की यह "हाई-रिस्क ट्रेड स्ट्रेटेजी" अमेरिका को नए स्वर्ण युग में ले जाने का सपना दिखाती है, लेकिन इसमें बड़े खतरे भी छिपे हुए हैं – चाहे वह बीजिंग के परेड ग्राउंड हों या अमेरिकी अदालतें।
निष्कर्ष
बीजिंग की भव्य सैन्य परेड केवल शक्ति प्रदर्शन नहीं थी, बल्कि यह चीन की उस महत्वाकांक्षा का प्रतीक है जिसके जरिए वह खुद को वैश्विक नेतृत्व की नई धुरी के रूप में स्थापित करना चाहता है। दूसरी ओर, डोनाल्ड ट्रंप की जोखिम भरी व्यापार नीतियाँ अमेरिका को आर्थिक और कूटनीतिक दोनों मोर्चों पर अलग-थलग करने का खतरा बढ़ा रही हैं।
आज की स्थिति यह साफ करती है कि दुनिया अब एक **नई भू-राजनीतिक वास्तविकता** की ओर बढ़ रही है, जहां चीन, रूस और भारत जैसे देश एकजुट होकर अमेरिकी वर्चस्व को चुनौती दे रहे हैं। ऐसे में ट्रंप की "अमेरिका फर्स्ट" रणनीति, चाहे कितनी भी आक्रामक क्यों न लगे, अंततः अमेरिका के लिए जोखिम भरा सौदा साबित हो सकती है।
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