फिलिस्तीन मुद्दे पर मोदी सरकार की चुप्पी: सोनिया गांधी का हमला
सोनिया गांधी का मोदी सरकार पर तीखा हमला
कांग्रेस संसदीय दल की अध्यक्षा सोनिया गांधी ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी सरकार की फिलिस्तीन मुद्दे पर चुप्पी को कड़ा आड़े हाथों लिया है। उन्होंने इसे “मानवता और नैतिकता का त्याग” करार देते हुए कहा कि भारत को इस संवेदनशील अंतरराष्ट्रीय मामले पर वैश्विक नेतृत्व दिखाना चाहिए।
सोनिया गांधी ने आरोप लगाया कि सरकार का रुख भारत की संवैधानिक मूल्यों या रणनीतिक हितों से प्रेरित नहीं दिखता, बल्कि यह प्रधानमंत्री मोदी और इजरायल के प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू की व्यक्तिगत मित्रता से प्रभावित प्रतीत होता है। उनके अनुसार, इस तरह की निजी कूटनीति स्थायी नहीं हो सकती और न ही यह भारत की विदेश नीति का मार्गदर्शन कर सकती है।
उन्होंने कहा कि भारत का इतिहास हमेशा अन्याय और शोषण के खिलाफ खड़े होने का रहा है। चाहे वह दक्षिण अफ्रीका में रंगभेद का मुद्दा हो, अल्जीरिया की स्वतंत्रता संग्राम हो या 1971 में बांग्लादेश की आज़ादी, भारत ने हमेशा पीड़ित और दबे-कुचले समाजों की आवाज़ उठाई है। ऐसे में फिलिस्तीन जैसे मानवीय संकट पर चुप्पी साधना भारत की गौरवशाली परंपरा से पीछे हटने जैसा है।
सोनिया गांधी ने गाजा की भयावह स्थिति का उल्लेख करते हुए कहा कि इजरायल की कार्रवाई ने लाखों लोगों को अकाल जैसी स्थिति में पहुंचा दिया है। हजारों बच्चों और नागरिकों की मौत हो चुकी है और भोजन, दवाइयों तथा मानवीय सहायता की डिलीवरी तक रोकी जा रही है। उन्होंने इसे “मानवता पर कलंक” बताया।
साथ ही उन्होंने यह भी कहा कि जब दुनिया के 150 से अधिक देश फिलिस्तीन को स्वतंत्र राष्ट्र के रूप में मान्यता दे चुके हैं, तब भारत का मौन रहना न केवल कूटनीतिक कमजोरी है बल्कि यह न्याय और मानवाधिकारों से विमुखता भी है।
“भारत की आवाज़ कभी भी इतनी कमजोर और मौन नहीं रही। आज का समय साहसी नेतृत्व और नैतिक स्पष्टता की मांग करता है। हमें फिलिस्तीन के साथ खड़ा होना चाहिए क्योंकि यह केवल विदेशी नीति का सवाल नहीं, बल्कि हमारी सभ्यता और नैतिक धरोहर का भी परीक्षण है।” – सोनिया गांधी
मोदी-बेंजामिन नेतन्याहू की व्यक्तिगत मित्रता पर सवाल
सोनिया गांधी ने आरोप लगाया कि सरकार की नीति मुख्य रूप से प्रधानमंत्री मोदी और इजरायल के प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू की व्यक्तिगत मित्रता से प्रभावित लगती है। उन्होंने कहा कि भारत की विदेश नीति व्यक्तिगत रिश्तों पर नहीं, बल्कि संवैधानिक मूल्यों और रणनीतिक हितों पर आधारित होनी चाहिए।
"इस तरह की निजी कूटनीति कभी स्थायी नहीं हो सकती और न ही यह भारत की विदेश नीति का मार्गदर्शन कर सकती है। हाल के महीनों में अमेरिका में भी इसी तरह के प्रयास असफल और अपमानजनक साबित हुए हैं," – सोनिया गांधी
भारत का ऐतिहासिक रुख और आज की चुप्पी
सोनिया गांधी ने याद दिलाया कि भारत ने 18 नवम्बर 1988 को फिलिस्तीन को स्वतंत्र राष्ट्र के रूप में मान्यता दी थी और हमेशा फिलिस्तीनी जनता के अधिकारों की पैरवी की है।
उन्होंने उदाहरण दिए कि –
भारत ने आज़ादी से पहले ही दक्षिण अफ्रीका में रंगभेद का मुद्दा उठाया था।
अल्जीरिया की आज़ादी (1954-62) में भारत मज़बूत आवाज़ बना।
1971 में भारत ने पूर्वी पाकिस्तान में नरसंहार रोककर बांग्लादेश के जन्म का मार्ग प्रशस्त किया।
लेकिन, उन्होंने कहा कि पिछले दो वर्षों से भारत ने फिलिस्तीन पर अपनी भूमिका लगभग छोड़ दी है।
गाजा में मानवीय संकट
सोनिया गांधी ने अपने लेख में इजरायल-फिलिस्तीन संघर्ष की भयावह तस्वीर पेश की।
अक्टूबर 2023 में हमास के हमले के बाद इजरायल की कार्रवाई "नरसंहार जैसी" बताई।
55,000 से अधिक फिलिस्तीनी नागरिकों की मौत, जिनमें 17,000 बच्चे शामिल।
गाजा की स्कूल, अस्पताल और कृषि-उद्योग पूरी तरह तबाह।
लाखों लोग अकाल जैसी स्थिति में, जबकि इजरायली सेना मदद पहुँचने में बाधा डाल रही है।
"भूख से तड़पते लोगों पर गोलियाँ चलाई जा रही हैं। यह इंसानियत के सबसे शर्मनाक कृत्यों में से एक है," – सोनिया गांधी
अंतरराष्ट्रीय स्तर पर बदलाव
सोनिया गांधी ने कहा कि अब फ्रांस, ब्रिटेन, कनाडा, पुर्तगाल और ऑस्ट्रेलिया जैसे देशों ने फिलिस्तीन को मान्यता दी है। कुल मिलाकर 193 में से 150 से अधिक देशों ने फिलिस्तीन राज्य को मान्यता दी है। उन्होंने इसे “इतिहास का अहम मोड़” बताया।
भारत की आवाज़ क्यों ज़रूरी?
सोनिया गांधी का कहना है कि भारत की आवाज़ दुनिया में हमेशा मानवाधिकार और न्याय के पक्ष में रही है। ऐसे में मौजूदा चुप्पी भारत की नैतिक जिम्मेदारी से पीछे हटना है।
उन्होंने लिखा –
"फिलिस्तीन का संघर्ष न्याय, पहचान, गरिमा और मानवाधिकारों के लिए है। भारत को इसे केवल विदेशी नीति का मुद्दा नहीं मानना चाहिए बल्कि अपनी सभ्यता और नैतिक धरोहर की कसौटी समझना चाहिए।"
ऐतिहासिक सहानुभूति की पुकार
सोनिया गांधी ने कहा कि फिलिस्तीनी जनता दशकों से विस्थापन, कब्ज़े, बस्तियों के विस्तार, आवाजाही पर पाबंदी और मानवाधिकार उल्लंघन का सामना कर रही है। यह भारत के उपनिवेश काल की पीड़ा से मेल खाता है।
"हम फिलिस्तीन के साथ ऐतिहासिक सहानुभूति रखते हैं और हमें इसे साहस के साथ ठोस कार्रवाई में बदलना होगा," – सोनिया गांधी
निष्कर्ष
सोनिया गांधी ने प्रधानमंत्री मोदी सरकार पर तीखा हमला करते हुए साफ कहा कि फिलिस्तीन जैसे संवेदनशील और मानवीय मुद्दे पर भारत की चुप्पी देश की वैश्विक भूमिका और नैतिक नेतृत्व दोनों को कमजोर करती है। उनका मानना है कि भारत केवल एक कूटनीतिक शक्ति नहीं, बल्कि ऐतिहासिक रूप से एक नैतिक आवाज़ भी रहा है, जिसने हमेशा स्वतंत्रता, न्याय और मानवाधिकारों के पक्ष में मजबूती से खड़े होकर दुनिया को दिशा दिखाई है।
भारत ने अतीत में दक्षिण अफ्रीका में रंगभेद, अल्जीरिया की आज़ादी और बांग्लादेश के जन्म जैसे संघर्षों में न्यायपूर्ण और साहसी रुख अपनाया था। यही कारण है कि आज जब फिलिस्तीन की जनता दशकों से कब्ज़े, विस्थापन, हिंसा और भूखमरी जैसी त्रासदियों से गुजर रही है, तब भारत का मौन रहना न केवल उसकी ऐतिहासिक धरोहर से दूरी बनाना है, बल्कि वैश्विक मंच पर उसकी नैतिक साख को भी चोट पहुँचाना है।
सोनिया गांधी ने यह भी स्पष्ट किया कि यह केवल एक विदेश नीति का मामला नहीं है, बल्कि भारत की सभ्यता, नैतिकता और मानवता की कसौटी है। यदि भारत अपने इतिहास और संवैधानिक मूल्यों के अनुरूप खड़ा होता है, तो वह न केवल फिलिस्तीन के लोगों के लिए आशा का स्रोत बनेगा, बल्कि दुनिया को यह भी संदेश देगा कि भारत आज भी न्याय और मानवाधिकारों का सच्चा प्रहरी है।
आख़िरकार, उनका कहना यही है कि भारत को साहसी, स्पष्ट और सिद्धांतवादी कदम उठाने होंगे। मौन रहना अब विकल्प नहीं है, क्योंकि चुप्पी तटस्थता नहीं, बल्कि अन्याय की मौन स्वीकृति मानी जाती है। फिलिस्तीन मुद्दे पर भारत की मज़बूत आवाज़ ही उसकी असली पहचान और नेतृत्व की गवाही होगी।
✍️ Call-to-Action
भारत को अब समय रहते अपनी ऐतिहासिक परंपरा, नैतिक मूल्यों और मानवीय जिम्मेदारियों के अनुरूप फिलिस्तीन के पक्ष में एक मज़बूत और न्यायपूर्ण रुख अपनाना चाहिए। यही कदम भारत की असली पहचान और उसके वैश्विक नेतृत्व की सच्ची गवाही होगा।
आज जब दुनिया फिलिस्तीन राज्य को मान्यता देने की ओर बढ़ रही है, ऐसे समय में भारत का मौन रहना न केवल कूटनीतिक कमजोरी है बल्कि इंसानियत और न्याय से विमुखता भी है।
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